आदित्यपुर

मौत पर राजनीति करने निकले JLKM नेता, खुद पार्टी में हुए बेनकाब

सोनी ऑटो विवाद में JLKM की अंदरूनी कलह सामने आई, बड़े नेता रहे गायब

आदित्यपुर (जमशेदपुर): झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के चंद नेताओं की गैर जिम्मेदाराना हरकतों से पार्टी की साख पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। हथियाडीह इंडस्ट्रियल पार्क स्थित सोनी ऑटो एंड एलाइड इंडस्ट्रियल लिमिटेड यूनिट-3 में ठेका श्रमिक सर्वेश्वर महतो (40) की मौत के बाद JLKM के कुछ नेताओं द्वारा की गई राजनीति से संगठन की फजीहत हो रही है।

बड़े नेता रहे गायब, कार्यकर्ता नाराज

मजदूर की मौत के बाद पार्टी नेताओं ने कंपनी के बाहर शव रख प्रदर्शन किया और 15 लाख रुपये मुआवजा तथा आश्रित को नौकरी की मांग की। लेकिन इस पूरे मामले में JLKM की अंदरूनी कलह उजागर हो गई। जिला अध्यक्ष दीपक महतो और पूर्व प्रत्याशी तरुण महतो के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन में स्थानीय कमेटी के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता नदारद रहे। इससे सवाल उठने लगे कि क्या यह प्रदर्शन पार्टी लाइन से अलग निजी राजनीति का हिस्सा था?

दरअसल बीते मंगलवार को ठेका श्रमिक सर्वेश्वर महतो (40) की कंपनी में काम के दौरान तबीयत खराब हो गई थी. कंपनी के एचआर प्रमुख संजीव बनर्जी ने बताया कि उन्हें उनके घर पहुंच कर दिया गया था जहां शुक्रवार को उनकी मौत हो गई. उसके बाद जेएलकेएम के नेताओं ने मजदूर के शव के साथ कंपनी के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिया. वे प्रबंधन से 15 लाख रुपए मुआवजा और आश्रित को नौकरी देने की मांग कर रहे थे, जिसे प्रबंधन ने मानने से इनकार कर दिया. अंततः पुलिस प्रशासन को मोर्चा संभालना पड़ा. शनिवार पूरी रात मृत मजदूर का शव कंपनी के बाहर पड़ा रहा. इस दौरान कई दौर की वार्ता हुई जिसे प्रबंधन ने मानने से हर बार इनकार किया. आंदोलन की शुरुआत ईचागढ़ विधानसभा से पूर्व प्रत्याशी रहे जेएलकेएम नेता तरुण महतो एवं सरायकेला- खरसावां जिला अध्यक्ष दीपक महतो की मौजूदगी में शुरू हुई, मगर पार्टी के स्थानीय कमेटी के अधिकारी एवं कार्यकर्ता मौजूद नहीं रहे जो कई सवालों को जन्म दे रहा है

. इस बीच रविवार को पुनः त्रिस्तरीय वार्ता हुई जिसमें कंपनी प्रबंधन, जेएलकेएम जिलाध्यक्ष दीपक महतो, गम्हरिया अंचल अधिकारी कुमार अरविंद बेदिया, सरायकेला अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी समीर कुमार सवैया, आदित्यपुर, आरआईटी, गम्हरिया एवं कांड्रा के थाना प्रभारी दलबल के साथ मौजूद रहे. करीब 5 घंटे चले वार्ता के दौरान कई बार स्थिति तनावपूर्ण हुई. अंतत: पुलिस ने जिलाध्यक्ष दीपक महतो, मिडिया प्रभारी प्रकाश महतो, वरुण महतो एवं एक अन्य कार्यकर्ता को हिरासत में ले लिया उसके बाद स्थिति बिगड़ता देख पार्टी के केंद्रीय संगठन सचिव विनोद स्वासी ने मोर्चा संभाला और प्रबंधन द्वारा मृतक के आश्रित को एक लाख रुपए मुआवजा एवं पत्नी को कंपनी पैरोल पर स्थाई नौकरी देने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. तब जाकर मृतक के शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. कंपनी प्रबंधन का कहना है कि जब मजदूर की मौत काम के दौरान नहीं हुई उस स्थिति में भारी भरकम मुआवजा देने का कोई औचित्य नहीं है. प्रबंधन मजदूर के परिवार के साथ खड़ा है. मानवता के नाते मृतक की पत्नी को कंपनी पैरोल पर नौकरी दिया जा रहा है इससे ज्यादा और कुछ नहीं दिया जा सकता.

अगर JLKM आलाकमान ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो पार्टी को आदित्यपुर क्षेत्र में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। संगठन की छवि, अनुशासन और जनसमर्थन पर यह पूरा मामला गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। 

इस पूरे घटनाक्रम में चौंकाने वाली बात यह रही कि JLKM के कई बड़े नेता पूरे घटनाक्रम से दूरी बनाए रखे। 

अब संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है —“क्या JLKM का पद अब केवल कुछ लोगों के निजी स्वार्थ का माध्यम बन गया है?”

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान जिन नेताओं ने पहले संगठन को मजबूत किया, उनकी भूमिका को दरकिनार कर दिया गया। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि संगठन के अंदर कुछ लोग जानबूझकर ‘राजनीतिक दुकानदारी’ चला रहे हैं, जो JLKM के मूल उद्देश्य और विचारधारा से गहरा समझौता है।

सूत्रो के अनुसार इस आंदोलन की स्क्रिप्ट जिला अध्यक्ष ने खुद तैयार की थी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं को जानबूझकर इससे दूर रखा गया। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी है कि आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया में JLKM के पद का इस्तेमाल कुछ नेता निजी स्वार्थ और के लिए कर रहे हैं।

JLKM में अंदरूनी खींचतान उजागर: पुराने संघर्षशील नेताओं को सूचना तक नहीं दी गई!

सोनी ऑटो यूनिट-3 में ठेका मजदूर की मौत के बाद हुए आंदोलन ने सिर्फ श्रमिक न्याय का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) की अंदरूनी राजनीति को भी बेनकाब कर दिया।

जो JLKM नेता पिछले कई सालों से लगातार मजदूरों की लड़ाई में आगे रहे हैं, उन्हें इस बार न तो आंदोलन की सूचना दी गई और न ही किसी वार्ता में शामिल होने का मौका मिला। ये वही नेता हैं जो हर बार संकट की घड़ी में संगठन का चेहरा बनकर सामने आते थे।

अब संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है —
क्या JLKM का पद अब केवल कुछ लोगों के निजी स्वार्थ का माध्यम बन गया है?”

कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। कई पुराने पदाधिकारियों का कहना है कि अगर ऐसे ही निजी स्वार्थ के लिए पार्टी का इस्तेमाल होता रहा, तो JLKM का जनाधार खत्म होना तय है।

 

 

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